Tuesday, March 9, 2010

ज़ुल्म ढाते हो मुस्कुराते हो

ज़ुल्म ढाते हो मुस्कुराते हो
दिल ये ऐसा कहाँ से लाते हो

नाम लेकर मुझे बुलाते हो
सारी महफ़िल को क्यों जलाते हो

इन्सां कमज़ोरियों का पैकर है
उससे उम्मीद क्यों लगाते हो

तुम तो आये थे ज़िन्दगी बनकर
छोड़कर मुझको कैसे जाते हो

हिचकियाँ बार-बार आती हैं
इस क़दर क्यों मुझे सताते हो

उम्र भर तुम रहोगे मेरे ही
ख़्वाब कितने हसीं दिखाते हो

जब भी देखा है सोच कर तुमको
दिल के नज़दीक मुस्कुराते हो

दोस्ती नाम है मुहब्बत का
दोस्ती क्यों नहीं निभाते हो

तुम जो देते हो बददुआ मुझको
'सोज़' कि ज़िन्दगी बढ़ाते हो

प्रोफेसर राम प्रकाश गोयल 'सोज़'
मोबाइल : 9412287787

पैकर - शरीर

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