Wednesday, June 24, 2009

ग़ज़ल

जब संवर के ग़ज़ल निकलती है
आरज़ू अपने हाँथ मलती है

जब कोई होती है तसव्वर में
जिंदगी करवटें बदलती है

चलता रहता है करवानें हयात
सुबह होती है शाम होती है

खून पतंगों का होता है नाहक
शम्मा जब भी कहीं पे जलती है

पिछली व् नौ जवानी व् पीरी
जिंदगी कितने घर बदलती है

जब सितम ढाता है कोई अपना
दिल पे तलवार ग़म की चलती है

आतिशे फिक्र से गुज़रती है
शेर की तब किरण निकलती है

उनकी फुरक़त में मुद्दतों से मेरी
चश्म ग़म के लहू उगलती है

याद उस शौख नाज़मी की "गुलाम"
सहने दिल में सदा टहलती है


गुलाम रसूल अंसारी

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