Saturday, June 27, 2009

ग़ज़ल

दिल की याद आई मुझे और न जिगर याद आया
हाँ मगर आप का बस तीरे नज़र याद आया

वक़्ते रुखसत वो निगाहें न मिलाना उनका
उम्र भर हाय यह अंदाज़े सफ़र याद आया


जिस जगह उसने कहा तेरा खुदा हाफिज़ है
जिंदगी भर मुझे हर लम्हा वो दर याद आया

चाँद की जब भी शबे ग़म में शुआऐं बिखरीं
और भी अपना मुझे रश्के क़मर याद आया

उफ़ ये रंगीनियाँ बाजारे जहाँ की तौबा
लुट गया जो भी यहाँ फिर उसे घर
याद आया

मेरी वहशत यह नहीं और तो फिर क्या है "उरूज"
जब भी पत्थर कोई देखा मुझे सर याद आया

उरूज "झांसवी'

गुल - फूल
सहर - सुबह का समय
शुआऐं - किरने
रश्क़े क़मर - माशूक से मुराद है वहशत - जंगलीपन
शबे ग़म - ग़मों की रात
उफ़ - तौबा

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