Wednesday, January 21, 2015

ठोकरें खा के जब संभलती है 
ज़िंदगी आईने में ढलती है 

पत्थर उस को ही मारे जाते हैं 
शाख जो भी ज़्यादा फलती है 

ज़िंदगी कामयाब वो है जो 
वक़्त के साथ साथ चलती है 

आतिशे ग़म ने कर दिया पत्थर 
अब ये मूरत कहाँ पिघलती है

 पाके सब कुछ कुछ और पाने की 
दिल में हसरत सदा मचलती है 


चैन की नींद को तो ज़रदारी 
रात भर करवटें बदलती है 

घर में सब से बुज़ुर्ग हों 'सालिक'
अब कहाँ मेरी बात चलती है 

वसी मोहम्मद खान 'सालिक'
मो- ८४००८२५२९० 





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