Monday, March 21, 2011

ढूंढते थे जो भी मुझ को हाँथ में खंजर लिये

ढूंढते थे जो भी मुझ को हाँथ में खंजर लिये
हम उन्हीं के हमसफ़र थे साथ में बख्तर लिये

खो गया जोश-ए-जुनूँ में आज दीवाना तेरा
दौड़ता फिरता है अपने हाँथ में पत्थर लिये

होश में आकर जो देखा प्यार से कहने लगा
मैं हिफाज़त के लिये था हाँथ में खंजर लिये

इम्तहान-ए-इश्क़ में क्या-क्या सितम हम ने सहे
अब सर तस्लीम ख़म है सामने दिलवर लिये

दिल में इस 'रम्मन' के अब भी हसरते दीदार है
फिर रहा है अपनी आँखों में हंसी मंज़र लिये

रमन लाल अग्रवाल 'रम्मन'
mobile. 9335911832



बख्तर - लोहे की कड़ियों का बना हुआ
जोश-ए-जुनूँ - दीवानगी
तस्लीम ख़म-हुक्म मानना

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