Thursday, January 22, 2009

सर्द लहर

एक लम्बी सदी के बाद
कोमा से निकली बाहर
पायताने पर बैठी यादों को
जी-भर देखा भी न था
सिरहाने बैठे आंसू सिसके
गर्दन घुमाकर, निरीह, आंखों में
उनकी जो झाँका तो वे तड़प उठे
अपने भीतर हाथ गहराकर
धूप का एक सर्द टुकडा
उनकी झोली में दिया डाल
यादों की आँखों में
दर्द की स्याह, सर्द लहर
चुपचाप कराह रही थी
सिले थे उसके होंठ
मैं उठी और पैर नीचे
लटका वजूद की पहन चप्पल
यादों का थामे हाथ
निकल पड़ी बीती सदी की ओर
रह गया पीछे
एक तिनका धुंआ

अंजु दुआ जैमिनी

No comments:

Post a Comment