Saturday, January 31, 2009

अपनों से आज दूर हुआ जा रहा हूँ मैं

अपनों से आज दूर हुआ जा रहा हूँ मैं
शायद किसी खता की सज़ा पा रहा हूँ मैं

किस्मत में धूप है तो क्यों साये से हो गिला
ठोकर क़दम क़दम पे नई खा रहा हूँ मैं

राहों की कुछ ख़बर है न मंजिल का है पता
अन्जान रास्तों पे चला जा रहा हूँ मैं
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मेहबूब की यह जिद थी तू घर छोड़ कर न जा
दिल तोड़ कर किसी का चला जा रहा हूँ मैं

पहचान थी कल तक मेरी महफिल में आपकी
गुमनाम महफिलों से हुआ जा रहा हूँ मैं

दुनियाँ ने आज छोड़ दिया 'अश्क' मेरा साथ
तन्हाईयों में आज जिया जा रहा हूँ मैं

उमर अश्क झांसवी

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