जिंदगी दांव पर लगाते हैं
दोष तक़दीर का बताते हैं
रोक पाओ तो रोक लो आंसू
हम तुम्हें हाल-ए दिल सुनते हैं
शाम होती है रोज़ ठेके पर
जाम से जाम खन खनाते हैं
जिंदगी रोते-रोते गुज़री है
लोग क्यों कुंडली मिलते हैं
हमारी तिशनगी का हाल मत पूंछो
प्यासे आये थे प्यासे जाते हैं
मेयक़दा उनका ख़ास है ऐसे
वो फ़क़त आँख से पिलाते हैं
दिल को रख दूंगा उनके क़दमों में
देखें कैसे कुचल के जाते हैं
दिल हमारा कांच से भी नाज़ुक है
आप क्यूँ बिजलियाँ गिरते हैं
डॉ रमेश कटारिया 'पारस'
Friday, December 25, 2009
Thursday, December 24, 2009
ग़ज़ल
जब से गया है छोड़के ये दिल उदास है
ऐसा भी लग रहा है के तू आस पास है
तुझ से बिछड़ से आज भी तन्हा नहीं हूँ मैं
खुशबु तेरे बदन की अभी मेरे पास है
तुम क्या गये के रूठ गयी हम से हर ख़ुशी
पैमाने ख़ाली हाँथ में ख़ाली गिलास है
आँखें खुली रहीं मेरी मरने के बाद भी
आँखों को मेरी आपके आने की आस है
आजा तू मेरे प्यार की चादर को ओढ़ कर
दीवाना तेरा तेरे लिए बदहवास है
जिसने भी तुझ को देखा वो तेरा ही हो गया
न जाने तेरे हुस्न में क्या खास बात है
मायूसियाँ 'नियाज़' के चेहरे की देखकर
ये गुल उदास चाँद सितारे उदास है
मोहम्मद नियाज़ महोब्वी
Sunday, November 15, 2009
ग़ज़ल
न ये ज़मीन तेरी है न आसमां तेरा है
दरो दीवार भी नहीं नहीं मकां तेरा है
निकल गया जो हाथ से वो कहाँ पाओगे
न तो वो वक़्त तेरा है नहीं समां तेरा है
नहीं देगी ये साथ महकी हुई ठंडी सबा
नहीं ये गुल तेरे ना ही गुलिस्ताँ तेरा
जो कर सके हर किसी की भलाई तेरी
फ़क़त इंसानियत तेरी, और इमां तेरा
प्रभा पाण्डे 'पुरनम'
दरो दीवार भी नहीं नहीं मकां तेरा है
निकल गया जो हाथ से वो कहाँ पाओगे
न तो वो वक़्त तेरा है नहीं समां तेरा है
नहीं देगी ये साथ महकी हुई ठंडी सबा
नहीं ये गुल तेरे ना ही गुलिस्ताँ तेरा
जो कर सके हर किसी की भलाई तेरी
फ़क़त इंसानियत तेरी, और इमां तेरा
प्रभा पाण्डे 'पुरनम'
Tuesday, November 10, 2009
साक्षरता
लड़का पढ़ रहे, लड़की पढ़ रही
पढ़ रहे कक्का भइया
हम सबको है साक्षर होने
तभी चलेगी नैया
शासन हमको खूब पढ़ा रही
लाभ भी हमको खूब पहुँचा रही
किताबें, कापी, पेन, पेंसिल
मुफ्त में मिल रहे भइया
पढ़ लो कक्का भइया
बच्चों को पढाएं, लिखायें
और होशियार बनाएं
जिससे वो अपनों उज्जवल
भविष्य बनाएं
अब तो वो तैयार हो गयी
बा रमुआ की मैया
पढ़ लो कक्का भइया
भारत विजय बगेरिया
पढ़ रहे कक्का भइया
हम सबको है साक्षर होने
तभी चलेगी नैया
शासन हमको खूब पढ़ा रही
लाभ भी हमको खूब पहुँचा रही
किताबें, कापी, पेन, पेंसिल
मुफ्त में मिल रहे भइया
पढ़ लो कक्का भइया
बच्चों को पढाएं, लिखायें
और होशियार बनाएं
जिससे वो अपनों उज्जवल
भविष्य बनाएं
अब तो वो तैयार हो गयी
बा रमुआ की मैया
पढ़ लो कक्का भइया
भारत विजय बगेरिया
Saturday, November 7, 2009
चौकस जो वतन की अब रखवाली नही होगी
चौकस जो वतन की अब रखवाली नही होगी
किसी भी काम की बेशक, ये खुशहाली नहीं होगी
गुज़र जायेंगे दुनिया से, तो बेहतर चैन पायेंगे
मुई तक़दीर इतनी तो, वहां काली नहीं होगी
मुझे ससुराल में अपनी, नहीं कुछ लुत्फ मिलता है
पता न था कुंवारे को, उधर साली नहीं मिलती
हमेशा ही उंडेली है, हलक़ में हमने बोतल से
हमारे हाथ में बंधु , दिखी प्याली नहीं होगी
मुझे उन रश्क़-परियों की, दुआओं ने बचाया है
नज़र शायद कभी मैली, जहाँ डाली नहीं होगी
'समीर' सब उम्दा हम्दों को, ख़ुदा पर नज़र करता है
यकीनन वाह या कोई, कहीं ताली नहीं होगी
पंडित मुकेश चतुर्वेदी 'समीर'
किसी भी काम की बेशक, ये खुशहाली नहीं होगी
गुज़र जायेंगे दुनिया से, तो बेहतर चैन पायेंगे
मुई तक़दीर इतनी तो, वहां काली नहीं होगी
मुझे ससुराल में अपनी, नहीं कुछ लुत्फ मिलता है
पता न था कुंवारे को, उधर साली नहीं मिलती
हमेशा ही उंडेली है, हलक़ में हमने बोतल से
हमारे हाथ में बंधु , दिखी प्याली नहीं होगी
मुझे उन रश्क़-परियों की, दुआओं ने बचाया है
नज़र शायद कभी मैली, जहाँ डाली नहीं होगी
'समीर' सब उम्दा हम्दों को, ख़ुदा पर नज़र करता है
यकीनन वाह या कोई, कहीं ताली नहीं होगी
पंडित मुकेश चतुर्वेदी 'समीर'
अमल जो भी करेंगे हम
अमल जो भी करेंगे हम, इसी पर फ़ैसला होगा
सही क्या है ग़लत क्या है, हमें यह सोचना होगा
भलाई गर किये हम कुछ, हमारा भी भला होगा
बुरा कुछ भी करेंगे तो, हमारा ही बुरा होगा
उबारा है उसे ख़ुद की, मेहनत और मशक्कत ने
कभी सोचो कि कितना वो, बियाबां में चला होगा
फरेबो-मक्र, खुदगर्जी, हसद में सब यूँ गाफिल हैं
ख़ुदा जाने इबादत में, रहा कोई मुब्तिला होगा
अमीरों कि ही सुनते हैं, अलम्बरदार धर्मों के
गरीबों का रहा शायद, अलग कोई ख़ुदा होगा
निगाहे-परवरिश तेरी, फिरासत बनकर आनी है
न जाने आसमां सर पर, मेरे कैसे साधा होगा
हमारी तंगदस्ती और ये दुनिया भर की नासाज़ी
'समीर' ये पिछले जन्मों का, मुसलसल सिलसिला होगा
पंडित मुकेश चतुर्वेदी 'समीर'
सही क्या है ग़लत क्या है, हमें यह सोचना होगा
भलाई गर किये हम कुछ, हमारा भी भला होगा
बुरा कुछ भी करेंगे तो, हमारा ही बुरा होगा
उबारा है उसे ख़ुद की, मेहनत और मशक्कत ने
कभी सोचो कि कितना वो, बियाबां में चला होगा
फरेबो-मक्र, खुदगर्जी, हसद में सब यूँ गाफिल हैं
ख़ुदा जाने इबादत में, रहा कोई मुब्तिला होगा
अमीरों कि ही सुनते हैं, अलम्बरदार धर्मों के
गरीबों का रहा शायद, अलग कोई ख़ुदा होगा
निगाहे-परवरिश तेरी, फिरासत बनकर आनी है
न जाने आसमां सर पर, मेरे कैसे साधा होगा
हमारी तंगदस्ती और ये दुनिया भर की नासाज़ी
'समीर' ये पिछले जन्मों का, मुसलसल सिलसिला होगा
पंडित मुकेश चतुर्वेदी 'समीर'
Tuesday, November 3, 2009
बिन तुम्हारे बसर किया हमने
बिन तुम्हारे बसर किया हमने
यूँ भी तन्हा सफर किया हमने
तुमने जीती है सल्तनत लेकिन
दिल मैं लोगों के घर किया हमने
आज के दौर मैं वफ़ा करके
अपने दामन को तर किया हमने
वजह उस पे यकीं की मत पूंछो
न था करना मगर किया हमने
वो उठाते हैं उँगलियाँ हम पर
जिनमें पैदा हुनर किया हमने
उनकी यादों के जाम पी पी के
दर्द को बेअसर किया हमने
जानता हूँ की बेवफा है वो
साथ फिर भी गुज़र किया हमने
जब भी दुनिया पे ऐतबार किया
ख़ुद को ही डर दर बदर किया हमने
दोस्ती में मिटा के ख़ुद को 'सोज़'
दोस्ती को अमर किया हमने
राम प्रकाश गोयल 'सोज़'
यूँ भी तन्हा सफर किया हमने
तुमने जीती है सल्तनत लेकिन
दिल मैं लोगों के घर किया हमने
आज के दौर मैं वफ़ा करके
अपने दामन को तर किया हमने
वजह उस पे यकीं की मत पूंछो
न था करना मगर किया हमने
वो उठाते हैं उँगलियाँ हम पर
जिनमें पैदा हुनर किया हमने
उनकी यादों के जाम पी पी के
दर्द को बेअसर किया हमने
जानता हूँ की बेवफा है वो
साथ फिर भी गुज़र किया हमने
जब भी दुनिया पे ऐतबार किया
ख़ुद को ही डर दर बदर किया हमने
दोस्ती में मिटा के ख़ुद को 'सोज़'
दोस्ती को अमर किया हमने
राम प्रकाश गोयल 'सोज़'
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