Friday, January 8, 2010

ग़ज़ल

नाम ही बस बदलते रहे
रिश्ते उलझे उलझते रहे

जिंदगी को न समझे कभी
हम हमेशा भटकते रहे

प्यार का जुर्म जिनसे हुआ
वह सज़ा भी भुगतते रहे

वह कभी न किसी के हुए
दोस्तों को बदलते रहे

जिनको दुनिया का दर ही न था
प्यार करते थे करते रहे

मेरा सम्मान क्या हो गया
दिल ही दिल में वह जलते रहे

जो न ईमां से अपने हटे
नाम दुनिया में करते रहे

कितने मासूम हैं वह मगर
बात मतलब की करते रहे

वह तो आराम से सो गये
'सोज़' करवट बदलते रहे

प्रोफेसर राम प्रकाश गोयल 'सोज़'
mob. 9412287787

ईमां - ईमान

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