Saturday, January 23, 2010

ग़ज़ल

चलो तुम्हारे लिये प्यार का सफ़र कर लें
गुनाह कोई करें राह मुख़्तसर कर लें

ज़माना हमको कहीं ठहरने नहीं देता
क़याम आज इधर है तो कल उधर कर लें

हमें जलायेगी सूरज की धूप भी इक दिन
तो बादलों को भी हम अपना हमसफ़र कर लें

तुम्हारा साथ अगर उम्र भर को मिल जाये
तमाम खोयी हुयी मंजिलों को सर कर लें

न जाने कौन सा लम्हा हमें डरा जाये
बहुत है शोर चलो खुद को बेख़बर कर लें

न जाने शाहजहाँ कोई फिर से मिल जाये
यह हाँथ काट के हम ख़ुद को बेहुनर कर लें

अँधेरी रात है तन्हाईयाँ हैं 'शाहीन'
हसीन ख़्वाब बुनें और फिर सहर कर लें

अर्चना तिवारी 'शाहीन'
mobile. 9415996375

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