Saturday, January 23, 2010

ग़ज़ल

मैं इन्तज़ार के दीपक जलाये बैठी हूँ
तुम्हारी राह में आँखें बिछाये बैठी हूँ

जो फूल तुमने किताबों में रख के भेजे थे
उन्हें मैं आज भी दिल से लगाये बैठी हूँ

तमाम घर तो महकता है उसकी खुशबू से
क्यूँ अपने जिस्म पे चन्दन लगाये बैठी हूँ

तुम्हारी राह अँधेरे न रोक पायेंगे
मैं अपनी पलकों पे जुगनू सजाये बैठी हूँ

है एक वो जो मुझे याद भी नहीं करता
मैं उसकी याद में दुनिया भुलाये बैठी हूँ

यक़ीन है वो सुहागन मुझे बनायेगा
मैं अपनी सेज पे कलियाँ सजाये बैठी हूँ

कोई भी ग़म उसे 'शाहीन' छू नहीं सकता
दुआ को हाँथ मैं अपने उठाये बैठी हूँ

अर्चना तिवारी 'शाहीन'
mobile 9415996375

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