Monday, December 28, 2009

ग़ज़ल

निगाहे दोस्त भी दुश्मन है क्या किया जाये
ज़हन के पर्दे में उलझन है क्या किया जाये

मेरे नसीब में कांटे है गुल का नाम न दो
उलझ के रह गया दामन है क्या किया जाये

न पाई ग़म से अमां जीते जी कभी हमने
ये ज़िन्दगी ही अभागन है क्या किया जाये

ख़ुशी का नाम जो आया तो आंख भर आई
ज़माना समझा के सावन है क्या किया जाये

गले लगाना तो चाहा था ज़िन्दगी को मगर
कफ़न मेरा ये दुल्हन है क्या किया जाये

किनारा कर तो ले ये 'नियाज़' आज दुनिया से
किसी का हाँथ में दामन है क्या किया जाये

मोहम्मद नियाज़ महोब्वी
mob. 9839930243

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