Monday, December 28, 2009

ग़ज़ल

वक़्त से क़ब्ल मर गया कोई
फूल बनकर बिखर गया कोई

नाम दुनिया में कर गया कोई
और बेनाम मर गया कोई

बेवफाई थी या कि मज़बूरी
वादा करके मुकर गया कोई

सबको मालूम है सबब इसका
क्यों इधर से उधर गया कोई

जैसे-जैसे चढ़ा शबाब का रंग
रफ्ता-रफ्ता संवर गया कोई

जिसकी दुनिया में सिर्फ खुशियाँ थीं
रंजो-ग़म में बिखर गया कोई

सिर्फ देखे की बस मुहब्बत है
वक़्त आया तो डर गया कोई

कैसे कुदरत का है निजाम ऐ 'सोज़'
किसको मरना था मर गया कोई

प्रोफेसर राम प्रकाश गोयल 'सोज़'
mob. 9412287787

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