Friday, December 25, 2009

ग़ज़ल

वही पत्ते वही कांटे वही डालियाँ मिली
जब अपने घर गया तो फ़क़त गालियाँ मिली

दोस्तों में मैं बड़े आराम से था दोस्त
रिश्तों में हर ओर मुझे जालियां मिली

पैसों की बात आई तो आयोजक मुकर गए
लोगों की सबसे ज़्यादा मुझको तालियाँ मिली

ख़्वाब तो नहीं देखा कल तुमने कोई 'पारस'
हरसू खिले थे फूल और हरयालियाँ मिली

डॉ रमेश कटारिया 'पारस'

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