Sunday, April 12, 2015

सुबह नौ आज मुस्कुराई है

सुबह नौ आज मुस्कुराई है
ज़िंदगी में बहार आई है

रहे उल्फत में रख दिया है क़दम
आशक़ी दाँव पर लगाई है

ख़ाक हो जाऊं फिर तो समझोगे
किस ने किस से वफ़ा निभाई है

आइने में मुझे उतार के देख
मेरे रग रग में परसाई है

बिक न जाऊं कहीं सरे बाज़ार
सब ने बोली मेरी लगाई है

ये शऊर ऐसे ही नहीं आया
वक़्त की मार उसने खाई है

कितना मायूस कुन है मुस्तक़बिल
सामने नफरतों की खाई है

जब भी उसकी अना पे चोट लगी
ख़ुदसरी कैसे मुस्कुराई है

मुफलिसी है मिरी बेक़ार 'जमील'
बंद मुट्ठी मेरी गदाई है

जमीलुर्रहमान 'जमील' झांसवी 

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