Thursday, April 9, 2015

मैं आफ़ताब की उम्मीद ले के बैठा हूँ

मैं  आफ़ताब  की उम्मीद ले के बैठा हूँ
न जाने कब ये  क़यामत की रात गुज़रेगी

मुझे यक़ीन था नज़दीक है मिरी मंज़िल
ख़बर न थी कि सफर में हयात गुज़रेगी

शब्बीर अहमद 'सरोश'

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