Sunday, February 8, 2009

सुहानी रात और ये चांदनी अच्छी नहीं लगती

सुहानी रात और ये चांदनी अच्छी नहीं लगती
तुम्हारे बिन तो अब ये ज़िन्दगी अच्छी नहीं लगती

तुम्हारी ही नज़र ने ज़िन्दगी को ताज़गी दी है
न फेरो अब नज़र बेगानगी अच्छी नहीं लगती

ज़रा आकर तो देखो हर तरफ़ जशने बहारां है
बहारों से भी ये नाराज़गी अच्छी नहीं लगती

अभी खिल जायेंगी कलियाँ ज़रा तुम मुस्कुराओ तो
तुम्हारे रुख़ पे ये अफ्सुर्दगी अच्छी नहीं लगती

हमारी ही तरह वो हीर राँझा भी तो बेबस थे
ये बंधन तोड़ दो अब बेबसी अच्छी नहीं लगती

सताए जो रुलाए और हमेशा दिल दुखाए है
'क़मर' हमको तो उससे दोस्ती अच्छी नहीं लगती

हाजी मोहम्मद सिद्दीक 'क़मर'

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