मन में भाव हो न हो
हाथ सलामी के लिए
उठ जाता है
और होंठ फैल जाते हैं
ये अभ्यास है सतत
इसे व्यवहारिकता कहते हैं
कोई दुखी हो या सुखी
ये पूछना दुनियावी रस्म
कैसे हो ?
क्या हाल-चाल है
भले ही आदमी लंगड़ा हो
या फटीचर
कोई कुछ करते हुए भी
दिख रहा हो
तब भी पूछना पड़ता है
क्या कर रहे हो
सभ्य आदमी
के यही लक्षण हैं
जिसे सब बुरा
कहें उसे तुम भी कहो
जिसे सब अच्छा कहें
उसे तुम अच्छा कहो
भले ही तुम उसे
जानते भी न हो
और कभी मिले भी न हो
ये शरीफ सभ्य, सामाजिक
व्यक्ति की पहचान है
देवेन्द्र कुमार मिश्रा
mob. 9425405022
Monday, December 28, 2009
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