Sunday, April 26, 2009

ग़ज़ल

पत्थर समझ के सबने जो ठुकरा दिया मुझे
उसने लगाया हाथ तो चमका दिया मुझे

आवाज़े हक़ उठाई तो ख़ामोश कर दिया
यूँ मेरे एहतिजाज़ का तोहफा दिया मुझे

छेडी थी मैंने जंग तो रोटी के वास्ते
बातों से उस बाखिल ने बहला किया मुझे

असली नहीं चलेगा सियासत में इस लिए
चेहरे पे इक लगाने को चेहरा दिया मुझे

मुझको बहुत गुरूर था ख़ुद पर यकीं करो
आईना फिर भी वक़्त ने दिखला दिया मुझे

शायद मेरे क़रीब में कोई खड़ा तो है
पत्तों ने सरसरा के ये बतला दिया मुझे

उल्फत है न खुलूस न दीवानगी की हद
घर उसने अपने दिल में ये कैसा दिया मुझे

मेरी ख्वाहिशातने नादिम किया 'नसीम'
कैसे सम्भालूं उसने तो इतना दिया मुझे

नसीम टीकमगढी

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